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इस राज्य में संस्कृत भाषा में पढ़ाई नहीं कर पाएंगे विद्यार्थी, बंद हो जाएंगे विद्यालय

अक्टूबर महीने में राज्य सरकार में वित्त और शिक्षा मंत्री हेमंता बिस्वा शर्मा द्वारा ऐलान किया गया था कि, असम में बीजेपी सरकार ने सरकारी मदरसों को लेकर बड़ा फैसला किया है। 

ऐलान किया गया था कि, सभी राज्य सरकार द्वारा संचालित मदरसों को स्कूल में बदल दिया जाएगा और कुछ मामलों में टीचर्स को सरकारी स्कूल में शिफ्ट करके मदरसा बंद होगा। 

इस संदर्भ में एक बार फिर से ख़बर सामने आई है कि, राज्य सरकार ने आखिरकार सभी सरकारी मदरसों और संस्कृत स्कूलों को बंद करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। 13 दिसंबर को हुई कैबिनेट मीटिंग में ये फैसला लिया गया था। वैसे इसी साल फरवरी में भी इस विषय पर चर्चा हुई थी। सरकारी मदरसों के संदर्भ में कहा गया था कि, सरकारी पैसे से चलने वाले मदरसों को या तो नियमित स्कूलों में बदला जाएगा या पूरी तरह बंद किया जाएगा। 

अब जबकि फैसले को मंजूरी मिल चुकी है तो शिक्षा मंत्री हेमंता बिस्वा शर्मा ने बयान दिया कि, ‘1934 में जब असम में सर सैय्यद सादुल्लाह के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग की सरकार थी तब असम में मदरसा शिक्षा की शुरुआत हुई थी। हमारी सरकार ने कैबिनेट मीटिंग में एजुकेशन सिस्टम बदलने और वास्तव में सेक्युलर बनाने का निर्णय किया है। सभी मदरसों को बंद किया जाएगा और इसे सामान्य स्कूलों में तब्दील किया जाएगा।

बता दें कि, इस तब अमल में लाया जाएगा जब स्टेट मदरसा एजुकेशन बोर्ड को एकेडमिक ईयर 2021-22 के रिजल्ट आ जाएंगे। फिर इसके बाद सारे रिकॉर्ड्स, बैंक अकाउंट्स और सारे स्टाफ स्टेट एजुकेशन बोर्ड को ट्रांसफर कर दिए जाएंगे। संस्कृत विद्यालयों को भारतीय विरासत और सभ्यता केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। संविधान को देखे तो वो राज्य की तरफ से धार्मिक शिक्षा की मनाही करता है।

तो इसे एक कारण माना जा सकता है। इसके अलावा सविधान में कई और भी बिन्दु है, तो इस कानून को तर्कसंगत बनाता है। इस नए कानून पर धार्मिक नज़रिए से विवाद भी है, लेकिन राज्य सरकार फैसले को लेकर स्पष्ट है कि, अरबी या किसी दूसरी भाषा या धार्मिक ग्रंथ की शिक्षा देना सरकार का काम नहीं है। राज्य के मदरसा एजुकेशन बोर्ड (SMEBA) के मुताबिक, असम में 614 सरकारी मान्यता प्राप्त मदरसे हैं।